तेल बाजार में उथल-पुथल: भारत की रणनीति और बढ़ती कीमतों का खतरा
भारत ने बदली आयात रणनीति, इराक बना सबसे बड़ा सप्लायर, रूस की वापसी तय—क्रूड 180 डॉलर पार जाने की आशंका

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, जिसका सीधा असर भारत की ऊर्जा रणनीति पर पड़ रहा है। फरवरी में इराक भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा, जबकि रूस दूसरे स्थान पर खिसक गया। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि मार्च में रूस फिर से शीर्ष स्थान हासिल कर सकता है।
फरवरी में रूस से तेल आयात में करीब 32% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि इराक से आयात बढ़कर 11.8 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। वहीं, सऊदी अरब से भी आयात में इजाफा हुआ है। कुल मिलाकर भारत के तेल आयात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी बढ़कर 59% तक पहुंच गई है, जो क्षेत्रीय निर्भरता को दर्शाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और होर्मुज जलसंधि में संभावित बाधाओं के कारण भारत ने फिर से रूसी तेल की ओर रुख किया है। अमेरिका द्वारा कुछ प्रतिबंधों में ढील दिए जाने से भी रूस से आयात बढ़ने की संभावना है, जो मार्च में 18 से 22 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।
इस बीच, सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि ईरान से जुड़ा युद्ध और ऊर्जा संकट अप्रैल के अंत तक जारी रहता है, तो क्रूड ऑयल की कीमत 180 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है। इससे वैश्विक बाजार में महंगाई बढ़ने और आर्थिक विकास पर नकारात्मक असर पड़ने की आशंका है।
हालांकि, हाल ही में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा आपूर्ति बनाए रखने के प्रयासों के चलते तेल की कीमतों में हल्की गिरावट भी दर्ज की गई है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज उछाल आ सकता है, जिसका सीधा असर आम जनता और उद्योगों पर पड़ेगा।
कुल मिलाकर, भारत की तेल आयात नीति अब अधिक लचीली और रणनीतिक होती जा रही है, लेकिन वैश्विक हालातों पर उसकी निर्भरता अब भी बनी हुई है। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिति ही तय करेगी कि तेल की कीमतें किस दिशा में जाएंगी।




