नाबालिग का गर्भपात मामले में डॉक्टर को राहत नहीं, हाईकोर्ट ने ट्रायल जारी रखने के दिए निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मरीज की उम्र का सत्यापन दस्तावेजों से करना डॉक्टर की जिम्मेदारी है, केवल मौखिक जानकारी पर्याप्त नहीं।
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने 16 वर्षीय नाबालिग के कथित अवैध गर्भपात से जुड़े मामले में आरोपी डॉक्टर को राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने डॉक्टर के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और POCSO अधिनियम के तहत ट्रायल में हस्तक्षेप करने से मना करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई नियमानुसार जारी रहेगी।
याचिकाकर्ता डॉक्टर ने अदालत में दलील दी थी कि गर्भपात के समय लड़की की उम्र 20 वर्ष बताई गई थी और उसने स्वयं प्रक्रिया के लिए सहमति दी थी। डॉक्टर का कहना था कि उसे यह जानकारी मरीज और उसके साथ आए लोगों से मिली थी, इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई उचित नहीं है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि किसी मरीज की उम्र केवल मौखिक जानकारी के आधार पर नहीं मानी जा सकती। डॉक्टर का दायित्व है कि वह जन्म प्रमाणपत्र, आधार कार्ड या अन्य वैध दस्तावेजों के माध्यम से उम्र का सत्यापन करे। यदि मामला नाबालिग से जुड़ा हो तो कानून के तहत संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देना भी अनिवार्य है।
अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर ट्रायल रोकने का कोई उचित कारण नहीं है। इसलिए निचली अदालत में चल रही कार्यवाही जारी रहेगी और मामले के सभी तथ्यों का परीक्षण साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा।
यह फैसला चिकित्सा पेशे से जुड़े लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजी सत्यापन की अनदेखी गंभीर परिणाम ला सकती है।



