सीखने की कोई उम्र नहीं: 78 साल की छात्रा ने MA में हासिल किया गोल्ड मेडल

सुषमा मोघे की अद्भुत कहानी: वृद्धावस्था में भी शिक्षा में उत्कृष्टता का उदाहरण

इंदौर। उम्र केवल एक संख्या है, यह सिद्ध कर दिखाया है 78 वर्षीय सुषमा मोघे ने। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV), इंदौर से एमए (मराठी) में गोल्ड मेडल जीतकर सुषमा ने यह साबित किया कि सीखने और ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं होती।

सुषमा मोघे का कहना है कि शिक्षा का जुनून और लगातार मेहनत ही सफलता की कुंजी है। परिवार और समाज की सीमित सोच ने उन्हें कभी हतोत्साहित नहीं किया। उन्होंने बताया कि जीवन में कभी भी सीखना बंद नहीं करना चाहिए। वृद्धावस्था में भी उनका अध्ययन उत्साह और लगन का प्रतीक रहा।

विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षकों ने सुषमा की मेहनत और उपलब्धियों की सराहना की। उन्होंने कहा कि सुषमा का प्रदर्शन सभी छात्रों के लिए प्रेरक है। उनके गोल्ड मेडल ने यह संदेश दिया कि इच्छाशक्ति और अनुशासन से किसी भी उम्र में शैक्षणिक उपलब्धि हासिल की जा सकती है।

सुषमा के परिवार ने भी उनका पूरा सहयोग किया। उनके पोते-पोतियों ने कहा कि दादी ने हमें दिखा दिया कि उम्र कभी भी सीखने की राह में बाधा नहीं बन सकती। उनके प्रयासों से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा केवल नौकरी या पद प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसंतुष्टि और ज्ञान बढ़ाने का मार्ग है।

सुषमा ने अपने अध्ययन के दौरान समय प्रबंधन, स्वास्थ्य और मानसिक तैयारी पर विशेष ध्यान दिया। विश्वविद्यालय ने उनके सम्मान में एक समारोह आयोजित किया, जिसमें उन्हें गोल्ड मेडल और प्रमाण पत्र प्रदान किया गया।

सुषमा मोघे की यह कहानी समाज में शिक्षा और सीखने के महत्व को नए आयाम देती है और सभी उम्र के छात्रों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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