सोमनाथ मंदिर पर नेहरू के रवैये को लेकर भाजपा-कांग्रेस का विवाद
भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू पर सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण और उसके महत्व का विरोध करने के आरोपों के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। कांग्रेस ने इन दावों को इतिहास की एकतरफा व्याख्या बताते हुए खारिज किया है और इसे मौजूदा राजनीति से प्रेरित करार दिया है।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राज्यसभा सांसद और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने स्वतंत्र भारत और सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी ऐतिहासिक पत्रावली को आधार बनाकर पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर तीखे आरोप लगाए हैं। त्रिवेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “एक्स” पर कई पुराने पत्रों को साझा करते हुए दावा किया कि नेहरू ने नहीं केवल मंदिर के जीर्णोद्धार का विरोध किया, बल्कि भारत की सभ्यतागत विरासत के प्रतीकों को कमतर दिखाने का प्रयास भी किया।
त्रिवेदी के अनुसार, नेहरू ने 1950-51 के दौरान लिखे गए पत्रों में सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण को “झूठा” और “अतिव्यस्त” बताया और पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत्त अली खान को लिखे पत्र में दरवाजों की कथा को पूरी तरह झूठा करार दिया। उसे उन्होंने ‘प्रिय नवाबजादा’ संबोधन के साथ लिखा था, जिसे भाजपा ने “आत्मसमर्पण” का संकेत बताया है।
भाजपा नेता ने यह भी दावा किया कि नेहरू ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और कैबिनेट मंत्रियों को पत्र लिखकर मंदिर के उद्घाटन समारोह में भाग न लेने की सलाह दी थी और कहा था कि इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि धूमिल हो सकती है। उन्होंने कहा कि नेहरू ने सूचना एवं प्रसारण मंत्री को पत्र लिखकर समारोह का प्रचार कम करने को कहा और उसे “आडंबरपूर्ण” बताया।
त्रिवेदी का कहना है कि नेहरू का रवैया एक तरह की “अंधा तुष्टीकरण राजनीति” का प्रतीक था, जिसमें वह पाकिस्तान और विदेशी दबावों को प्राथमिकता देते हुए भारत की संस्कृति और धार्मिक प्रतीकों को कमजोर दिखाने की कोशिश कर रहे थे। उन्होंने आरोप लगाया कि नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पूरी तरह विरोध किया और भारत की सभ्यता-स्मृति को बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाने की आवश्यकता को नजरअंदाज किया।
यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तहत मंदिर में कार्यक्रमों में शामिल होने वाले हैं, और भाजपा इसे संस्कृतिक सम्मान और गौरव का प्रतीक बना रही है। वहीं, कांग्रेस की ओर से इस आरोप को राजनीतिक इतिहास की एकतरफा व्याख्या करार दिया जा रहा है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों को वर्तमान राजनीति में इस्तेमाल किया जा रहा है।
कुल मिलाकर यह विवाद इतिहास और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक विचारधाराओं का टकराव दर्शाता है, जिसमें दोनों पक्ष अपने-अपने दृष्टिकोण को जनता के बीच मजबूती से पेश कर रहे हैं।





