केजीएमयू में अब बिना एमआरआई डिप्रेशन और डिमेंशिया की होगी पहचान

ईईजी और एआई मॉडल से जल्द और सस्ती निदान प्रक्रिया, ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों तक पहुंच आसान

लखनऊ: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के वृद्धावस्था एवं मानसिक रोग विभाग ने मानसिक बीमारियों की पहचान के लिए नई तकनीक अपनाई है। अब डिप्रेशन और डिमेंशिया जैसी बीमारियों का पता लगाने के लिए एमआरआई की बजाय ईईजी (Electroencephalography) जांच का उपयोग किया जाएगा। इस विधि का सफल अध्ययन 50 रोगियों पर किया गया है। विभाग ने निजी विश्वविद्यालय के सहयोग से एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मॉडल भी विकसित किया है, जो ईईजी डेटा के माध्यम से शुरुआती लक्षणों का विश्लेषण करेगा।

वृद्धावस्था एवं मानसिक रोग विभाग के अध्यक्ष प्रो. श्रीकांत श्रीवास्तव ने बताया कि डिप्रेशन के शुरुआती चरण में पहचान होने पर इसका इलाज संभव है। जबकि डिमेंशिया का इलाज फिलहाल उपलब्ध नहीं है, लेकिन दवाओं के माध्यम से इसकी प्रगति धीमी की जा सकती है। ईईजी जांच गैर-आक्रामक है, कम समय में पूरी हो जाती है और एमआरआई की तुलना में लागत भी कम है।

इस नई तकनीक से मरीजों को एमआरआई की लंबी प्रतीक्षा सूची से राहत मिलेगी। ईईजी जांच ग्रामीण और छोटे शहरों में भी आसानी से उपलब्ध हो सकती है, जिससे मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यापक पहुंच सुनिश्चित होगी। यह विधि मस्तिष्क में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों का पता लगाने में सक्षम है, जो डिप्रेशन और डिमेंशिया के शुरुआती लक्षणों की पहचान करने में मदद करती है।

केजीएमयू के डॉ. श्रीकांत शर्मा के मुताबिक, देश में बुजुर्गों की आबादी तेजी से बढ़ रही है और डिमेंशिया आमतौर पर 60 वर्ष के बाद दिखाई देती है। लगभग हर घर में एक बुजुर्ग सदस्य होने के कारण यह समस्या व्यापक हो रही है। मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से दूरदराज के क्षेत्रों में भी निदान की सुविधा दी जा सकेगी, जिससे मरीज समय पर उपचार प्राप्त कर सकेंगे और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ेगी।

इस पहल से न केवल रोगियों को जल्दी पहचान और उपचार मिलेगा, बल्कि देश में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने में भी मदद मिलेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में इस तकनीक से मानसिक बीमारियों के प्रबंधन में क्रांतिकारी बदलाव संभव है।

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