Gold vs Govt: आजादी के बाद से सोना क्यों बना हर सरकार की सबसे बड़ी चुनौती?
भारत में सोना सिर्फ धातु नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत और सरकारों के लिए सिरदर्द—जानिए कैसे दशकों से चलता आ रहा है “Gold vs Govt” का खेल
भारत में सोना सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और सरकारों की नीतियों को सीधे प्रभावित करता रहा है। आजादी के बाद से लेकर मोदी सरकार तक, हर शासनकाल में सोना एक ऐसी “अदृश्य ताकत” बना रहा है जिसने कभी समर्थन किया तो कभी सरकारों के लिए चुनौती खड़ी कर दी।
आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत के पास विदेशी मुद्रा (Forex) की भारी कमी थी। उस समय सरकार को सोने को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियम बनाने पड़े। 1960–70 के दशक में हालात इतने खराब थे कि सोने की तस्करी एक बड़ा मुद्दा बन गई। सरकार ने इमरजेंसी जैसी स्थिति में सोने पर कई प्रतिबंध लगाए, लेकिन इसके बावजूद देश में सोने की मांग कम नहीं हुई।
1978 में भारत सरकार ने गोल्ड कंट्रोल एक्ट के तहत नागरिकों पर सोने के भंडारण और व्यापार को नियंत्रित करने की कोशिश की। लेकिन यह नीति सफल नहीं हो पाई, क्योंकि भारतीय समाज में सोना सिर्फ निवेश नहीं बल्कि परंपरा और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।
1991 का आर्थिक संकट भारत के इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया कि सरकार को मजबूरी में देश का सोना विदेशों में गिरवी रखना पड़ा। यह घटना “Gold vs Govt” की सबसे बड़ी मिसाल बन गई, जब सोना ही देश को संकट से बाहर निकालने का माध्यम बना।
इसके बाद उदारीकरण (Liberalization) के दौर में सोने पर नियंत्रण थोड़ा कम हुआ, लेकिन इसकी मांग लगातार बढ़ती रही। भारत आज भी दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में से एक है। इसका सीधा असर देश के Current Account Deficit (CAD) पर पड़ता है।
2013 में UPA सरकार ने सोने के आयात पर कई प्रतिबंध लगाए, जैसे इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाना और गोल्ड स्कीम्स को बढ़ावा देना। लेकिन इससे अवैध तस्करी बढ़ गई। फिर 2017 में मोदी सरकार ने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड जैसी योजनाएं शुरू कीं, ताकि लोगों का सोना बैंकिंग सिस्टम में आए।
आज स्थिति यह है कि सोना अभी भी सरकारों के लिए एक “डबल एज्ड तलवार” बना हुआ है। एक तरफ यह जनता की बचत और आर्थिक सुरक्षा है, तो दूसरी तरफ यह विदेशी मुद्रा पर दबाव डालने वाला सबसे बड़ा कारण भी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में सोने की मांग संस्कृति, शादी-ब्याह और निवेश की आदतों से जुड़ी हुई है, इसलिए कोई भी सरकार इसे पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर पाई।
Gold vs Govt का यह खेल आज भी जारी है। नीतियां बदलती हैं, सरकारें बदलती हैं, लेकिन सोने की चमक और उसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर हमेशा बना रहता है।





