भारत–यूएई रक्षा समझौता: क्या यह पाकिस्तान–सऊदी डिफेंस डील के जवाब में बदला सामरिक संतुलन है?

पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति में भारत, यूएई, सऊदी अरब और पाकिस्तान के नए समीकरण

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल नहयान का हालिया और बेहद संक्षिप्त भारत दौरा पश्चिम एशिया की राजनीति में कई संकेत छोड़ गया है। नई दिल्ली में केवल कुछ घंटों की मौजूदगी के दौरान भारत और यूएई ने रणनीतिक रक्षा साझेदारी के लिए लेटर ऑफ इंटेंट पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद यह सवाल जोर पकड़ने लगा है कि क्या यह समझौता सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए डिफेंस पैक्ट का जवाब है।

यह दौरा इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले यूएई के राष्ट्रपति पाकिस्तान का दौरा कर चुके थे और सितंबर 2025 में सऊदी अरब तथा पाकिस्तान के बीच एक ऐसा रक्षा समझौता हुआ था, जिसे कई विश्लेषक नेटो के अनुच्छेद-5 जैसा मानते हैं। इस समझौते के अनुसार, सऊदी या पाकिस्तान में से किसी एक पर हमला, दोनों पर हमला माना जाएगा। इसमें तुर्की की संभावित भूमिका ने भी क्षेत्रीय संतुलन को और जटिल बना दिया है।

भारत और यूएई के बीच पहले से ही मजबूत रणनीतिक साझेदारी मौजूद थी, लेकिन रक्षा सहयोग को औपचारिक रूप से इस स्तर पर शामिल किया जाना एक नया मोड़ है। पूर्व राजनयिक तलमीज़ अहमद के अनुसार, यह साझेदारी ऐसे समय पर सामने आई है जब पश्चिम एशिया में हालात अत्यंत अनिश्चित हैं—ईरान-अमेरिका तनाव, ग़ज़ा संकट, इस्राइल-यूएई समीकरण और सऊदी-यूएई के बीच बढ़ती दूरी इस क्षेत्र को अस्थिर बना रही है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यूएई, परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब के रक्षा गठजोड़ का संतुलन बनाने के लिए परमाणु शक्ति संपन्न भारत के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है। हालांकि भारत सरकार इस तर्क से सहमत नहीं दिखती। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने स्पष्ट किया कि भारत-यूएई रक्षा सहयोग को किसी विशेष क्षेत्रीय घटना की प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह पहले से मौजूद सहयोग का स्वाभाविक विस्तार है।

रणनीतिक विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारत की पश्चिम एशिया नीति को केवल पाकिस्तान के संदर्भ में नहीं देखा जा सकता। भारत के सऊदी अरब और यूएई—दोनों के साथ गहरे ऊर्जा, व्यापारिक और प्रवासी संबंध हैं। भारत ने परंपरागत रूप से खाड़ी क्षेत्र के टकरावों से दूरी बनाए रखी है और संतुलन की नीति अपनाई है।

आर्थिक दृष्टि से भी भारत-यूएई संबंध बेहद मजबूत हैं। यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है। दोनों देशों ने 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, यूएई में 43 लाख से अधिक भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो इसे भारत के लिए सामाजिक और आर्थिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।

कुल मिलाकर, भारत और यूएई की रणनीतिक रक्षा साझेदारी को पाकिस्तान-सऊदी डिफेंस डील के सीधे जवाब के रूप में देखना सरलीकरण हो सकता है। यह समझौता दरअसल बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय हालात में भारत की बहुस्तरीय कूटनीति, संतुलन साधने की रणनीति और पश्चिम एशिया में दीर्घकालिक हितों की रक्षा का संकेत देता है।

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