एलपीजी संकट के बीच सरकार का नया फोकस: क्यों बढ़ाया जा रहा पीएनजी का इस्तेमाल?

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट और गैस आपूर्ति बाधित होने के बाद सरकार ने शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड नैचुरल गैस को बढ़ावा देने की बनाई रणनीति

पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुए संकट का असर अब भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर भी दिखाई देने लगा है। एलपीजी की सप्लाई प्रभावित होने के बाद सरकार ने एक नई रणनीति के तहत शहरी क्षेत्रों में पाइप्ड नैचुरल गैस यानी पीएनजी को बढ़ावा देने का फैसला किया है।

भारत अपनी घरेलू एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 से 62 प्रतिशत हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इनमें से अधिकतर आपूर्ति पश्चिम एशिया से आती है और इसका बड़ा हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते भारत पहुंचता है। हालिया तनाव के कारण इस मार्ग से टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे एलपीजी की आपूर्ति में गिरावट देखी जा रही है।

इस स्थिति से निपटने के लिए पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उन शहरी उपभोक्ताओं से एलपीजी कनेक्शन सरेंडर करने को कहा है जिनके घरों में पहले से पीएनजी कनेक्शन मौजूद है। सरकार का उद्देश्य एलपीजी की उपलब्धता को ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षित रखना है, खासकर प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए।

तकनीकी दृष्टि से एलपीजी और पीएनजी में बड़ा अंतर है। एलपीजी मुख्य रूप से प्रोपेन और ब्यूटेन का मिश्रण होती है और सिलेंडरों में उच्च दबाव पर संग्रहित की जाती है, जबकि पीएनजी प्राकृतिक गैस से बनती है और पाइपलाइन के माध्यम से सीधे घरों तक पहुंचाई जाती है। सुरक्षा के लिहाज से भी पीएनजी को अधिक सुरक्षित माना जाता है क्योंकि यह हवा से हल्की होती है और रिसाव की स्थिति में जल्दी फैल जाती है।

आर्थिक दृष्टि से भी पीएनजी उपभोक्ताओं के लिए लाभकारी साबित हो सकती है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, समान मात्रा में खाना पकाने के लिए पीएनजी का खर्च एलपीजी की तुलना में प्रति माह लगभग 300 से 400 रुपये तक कम हो सकता है।

दीर्घकालिक रणनीति के तहत पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस नियामक बोर्ड ने 2030 तक भारत के ऊर्जा मिश्रण में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को 15 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए देशभर में लगभग 33,500 किलोमीटर लंबा गैस पाइपलाइन नेटवर्क विकसित किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि पीएनजी नेटवर्क के विस्तार से न केवल एलपीजी पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी और पर्यावरण पर पड़ने वाला असर भी कम होगा।

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