आसाराम बापू की बेल बरकरार, SC ने रद्द करने की याचिका खारिज की

उच्चतम न्यायालय ने कहा—मेडिकल ग्राउंड को देखते हुए हस्तक्षेप उचित नहीं, हाई कोर्ट से अपील की सुनवाई में तेजी लाने के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आसाराम बापू की चिकित्सा जमानत को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, जिससे उनकी बेल फिलहाल प्रभावी बनी रहेगी। अदालत ने कहा कि उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक है, कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और लगातार मेडिकल निगरानी की आवश्यकता रहती है, इसलिए हाई कोर्ट द्वारा दी गई राहत में तुरंत हस्तक्षेप करना न्यायिक संतुलन के खिलाफ होगा। याचिकाकर्ता ने यह आरोप लगाया था कि आसाराम अपनी प्रतिष्ठा और प्रभाव का उपयोग करके मुकदमे को प्रभावित कर सकते हैं, गवाहों पर दबाव डाल सकते हैं और न्याय प्रक्रिया को बाधित कर सकते हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए इन आशंकाओं को ठोस आधारों से रहित माना कि हाई कोर्ट ने निर्णय लेने से पहले चिकित्सीय रिपोर्ट, उम्र और वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति का विस्तृत परीक्षण किया था। अदालत ने यह भी टिप्पणीकृत किया कि यदि स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियां किसी आरोपी को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही हों, तो न्यायालयों को मानवीय आधार पर राहत पर विचार करना ही होता है क्योंकि संविधान भी एक ऐसे न्याय की बात करता है जिसमें कठोरता से अधिक संतुलन और संवेदना को महत्व दिया जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने राजस्थान हाई कोर्ट को कड़ी हिदायत दी कि आसाराम के खिलाफ लंबित आपराधिक अपील, जो बीते कई वर्षों से तय नहीं हो पाई है, उसे तेज गति से सुना जाए और बिना अनावश्यक स्थगन के जल्द से जल्द निर्णय दिया जाए क्योंकि अत्यधिक देरी न केवल पीड़िता के अधिकारों का हनन करती है बल्कि न्याय व्यवस्था में जनता का भरोसा भी कमजोर करती है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जमानत का जारी रहना किसी भी तरह से मामले की गंभीरता को कम नहीं करता और न ही इसका अर्थ यह है कि आरोपी दोषमुक्त होने की ओर बढ़ रहे हैं; इसका मतलब केवल इतना है कि चिकित्सा कारणों को देखते हुए उन्हें अदालत में उपस्थिति के बजाय इलाज की सुविधा की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर भविष्य में यह साबित होता है कि आसाराम ने जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया, तो अदालत के पास राहत वापस लेने का पूरा अधिकार रहेगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद आसाराम को फिलहाल राहत मिली है, लेकिन उनके खिलाफ लंबित अपील की सुनवाई तेज होने से आने वाले महीनों में मामला एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है, जिसके परिणाम न केवल आरोपी के भविष्य पर बल्कि पीड़िता और समाज के न्यायिक दृष्टिकोण पर भी गहरा प्रभाव डालेंगे।

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